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उड़ीसा के पुरी जगन्नाथ धाम से महेंद्र नामदेव की रिपोर्ट
पुरी की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा से पहले एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जो भगवान और भक्त के रिश्ते को और भी आत्मीय बना देती है। रथयात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा पूरे 15 दिनों तक भक्तों को दर्शन नहीं देते। मान्यता है कि इस दौरान भगवान बीमार हो जाते हैं और विशेष कक्ष में विश्राम करते हैं। आखिर इन 15 दिनों में भगवान कहाँ रहते हैं और उनके साथ क्या होता है… आइए जानते हैं।

ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में देव स्नान पूर्णिमा का भव्य आयोजन होता है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को गर्भगृह से बाहर लाकर 108 कलशों के पवित्र जल से महास्नान कराया जाता है। वैदिक मंत्रों, शंखध्वनि और भजन-कीर्तन के बीच होने वाला यह अनुष्ठान लाखों श्रद्धालुओं के लिए बेहद खास होता है। स्नान के बाद भगवान को प्रसिद्ध ‘गज वेश’ यानी हाथी स्वरूप में भी सजाया जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, 108 कलशों से शीतल जल के महास्नान के बाद भगवान को ज्वर हो जाता है। इसके बाद मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं और भगवान को मंदिर परिसर के भीतर स्थित विशेष कक्ष ‘अनसर घर’ में ले जाया जाता है। इस अवधि को ‘अनसर’ या ‘अनवसर’ काल कहा जाता है। इन 15 दिनों तक आम श्रद्धालुओं के लिए भगवान के दर्शन पूरी तरह बंद रहते हैं।

अनसर काल में केवल दैतापति सेवकों को भगवान की सेवा करने का अधिकार होता है। भगवान को औषधीय पेय, जड़ी-बूटियों से बने विशेष भोग, दशमूल मोदक और फुलुरी तेल अर्पित किया जाता है। इसी दौरान भगवान के विग्रहों का विशेष उपचार, रंग-रोगन, नवीनीकरण और श्रृंगार भी किया जाता है। जब तक भगवान विश्राम करते हैं, तब तक भक्त ‘अनसर पट्टी’ यानी भगवान के चित्र स्वरूप के दर्शन और पूजा करते हैं।

इस परंपरा के पीछे एक भावपूर्ण कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ के परम भक्त माधव दास गंभीर रूप से बीमार हो गए थे। अपने भक्त का कष्ट देखकर भगवान स्वयं उनकी सेवा करने पहुंचे और उनकी बीमारी अपने ऊपर ले ली। तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि देव स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान भी 15 दिनों तक अस्वस्थ होकर विश्राम करते हैं। यह कथा भगवान और भक्त के अटूट प्रेम और करुणा का प्रतीक मानी जाती है।

करीब पंद्रह दिनों के विश्राम के बाद भगवान पहली बार भक्तों को ‘नवयौवन दर्शन’ देते हैं। मान्यता है कि इस समय भगवान पूरी तरह स्वस्थ होकर नए तेज और नई ऊर्जा के साथ दर्शन देते हैं। इसके अगले ही दिन भव्य रथयात्रा निकलती है, जिसमें भगवान स्वयं अपने रथ पर सवार होकर मंदिर से बाहर आते हैं और अपने भक्तों के बीच पहुंचते हैं।

भगवान जगन्नाथ की यह अनूठी परंपरा सनातन संस्कृति का गहरा संदेश देती है। यहां भगवान केवल पूजे नहीं जाते, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह उनकी सेवा, देखभाल और उपचार भी किया जाता है। भगवान का बीमार होना उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि भक्तों के प्रति उनके स्नेह, अपनत्व और करुणा का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि पुरी की रथयात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भगवान और भक्त के अटूट प्रेम का जीवंत उत्सव है।





