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छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर जिले से महेंद्र नामदेव की रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में अंबिकापुर से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित रामगढ़, जिसे रामगिरि पर्वत के नाम से भी जाना जाता है, प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक धरोहरों में से एक है। यह वही स्थान माना जाता है जहां भगवान श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ कुछ समय व्यतीत किया था। यही कारण है कि यह क्षेत्र आस्था, इतिहास और संस्कृति का अद्भुत संगम माना जाता है। इसके साथ ही यह स्थान विश्व प्रसिद्ध संस्कृत महाकवि कालिदास की अमर कृति ‘मेघदूत’ से भी जुड़ा हुआ है, जिससे इसकी ऐतिहासिक पहचान और भी विशेष हो जाती है।
रामगढ़ की पहाड़ियों पर स्थित सीताबेंगरा गुफा को विश्व की सबसे प्राचीन प्राकृतिक नाट्यशालाओं में गिना जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लगभग दो हजार वर्ष पहले यहां सांस्कृतिक और नाट्य प्रस्तुतियां आयोजित होती थीं। इसके समीप स्थित जोगीमारा गुफा अपनी प्राचीन चित्रकारी और ब्राह्मी लिपि में लिखे शिलालेखों के लिए प्रसिद्ध है। इन शिलालेखों को भारत की सबसे प्राचीन प्रेम कथाओं में से एक माना जाता है। यही कारण है कि देश-विदेश से इतिहासकार, पुरातत्वविद और शोधकर्ता इस स्थल का अध्ययन करने यहां पहुंचते हैं।
रामगढ़ का संबंध केवल इतिहास से ही नहीं बल्कि भारतीय साहित्य से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। विद्वानों का मानना है कि महाकवि कालिदास ने इसी रमणीय पर्वत पर बैठकर अपनी विश्वप्रसिद्ध रचना ‘मेघदूत’ की कल्पना की थी। चारों ओर फैले घने जंगल, शांत वातावरण, बादलों से घिरी पहाड़ियां और प्राकृतिक सौंदर्य आज भी उस साहित्यिक प्रेरणा का अनुभव कराते हैं। यही वजह है कि रामगढ़ को साहित्य प्रेमियों के लिए भी एक पवित्र और प्रेरणादायक स्थल माना जाता है।
रामगढ़ में स्थित सीता कुंड, लक्ष्मण गुफा, प्राकृतिक जलस्रोत और टोपी के आकार की विशाल पहाड़ी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। मानसून के मौसम में यहां का दृश्य और भी मनमोहक हो जाता है, जब पूरी पहाड़ी हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। धार्मिक आस्था, प्राचीन इतिहास, अद्भुत पुरातत्व और प्राकृतिक सौंदर्य का ऐसा दुर्लभ संगम बहुत कम स्थानों पर देखने को मिलता है। यही कारण है कि रामगढ़ आज छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत का गौरव और प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में अपनी विशेष पहचान बनाए हुए है।








